Aurangzeb History in Hindi – औरंगजेब का शुरू से लेकर अंत तक का पूरा इतिहास

Aurangzeb History in Hindi: गजेब आलमगीर ( 1658 – 1707 ई ) मुहाउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब का जन्म 1 नवम्बर , 1618 ई . में उज्जैन के निकट दोहद ‘ नामक स्थान पर मुमताजमहल के गर्भ से हुआ था । उसने कुरान , अरबी , फारसी . तक्री तथा हिन्दी की अच्छा जान प्राप्त कर लिया था । सैनिक शिक्षा में भी उसने योग्यता प्राप्त की थी । बंदेलखण्ड के राजा जुझार सिंह के विद्रोह का उसने दमन किया । 1636 ई . से 1644 ई . तक तथा 1652 ई से 1658 ई . तक औरंगजेब दक्षिण का राज्यपाल रहा । वह मुल्तान ( 1640 ई . ) तथा गुजरात ( 1645 इ . ) का गवर्नर भी रहा ।

Aurangzeb History

 

औरंगजेब का पूरा इतिहास हिंदी में पढ़ें – Aurangzeb History 

अपने भाइयों से निपटने के पश्चात् औरंगजेब ने 31 जुलाई , 1658 ई . को आगरा में पहली बार तथा जून , 1659 ई . में दूसरी बार दिल्ली में अपना औपचारिक राज्याभिषेक ‘ अकल मुजफ्फर आलमगीर ‘ की उपाधि के साथ करवाया । औरंगजेब ने सर्वप्रथम अनेक करों तथा ‘ राहदारी ‘ , ‘ पिण्डारी ‘ अर्थात् ‘ भूमिका ‘ तथा ‘ गृहकर आदि लगभग 18 करों को समाप्त कर दिया । खाफी खां ने इनमें से केवल 14 करों का उल्लेख किया है । उसने सिक्कों पर ‘ कलमे ‘ को लिखा जाना बंद करवा दिया , जिससे गैर – मुस्लिमों के छए जाने से यह अपवित्र न हो जाए । उसने फारस के ‘ नौरोज ‘ के त्योहार को मनाया जाना बंद करवाया तथा प्रजा के चरित्र की निगरानी करने हेतु ‘ मुहतसिब ‘ नियुक्त किए ।

पूर्वी सीमान्त का युद्ध ( 1661 – 1666 ई . ) 

दिसम्बर , 1661 ई . में बिहार के राज्यपाल दाऊद खां ने पोलमन जीता । मीर जुमला को बंगाल की राज्यपाल नियुक्त किया गया । उसने कूचबिहार व असम को जीता । वह चीन पर आक्रमण करना चाहता था , किन्तु मार्च 1663 ई . में उसकी मृत्य हो गई । शाइस्ता खां को दक्षिण से बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया । उसने पुर्तगाली और बर्गी समुद्री लुटेरों का दमन किया तथा जनतरी 1666 ई . में अराकान के राजा से चटगांव प्राप्त किया ।

उत्तर पश्चिमी सीमान्त नीति

इस प्रदेश के प्रति औरंगजेब ने राजनैतिक और । आर्थिक कारणों से उदार नीति अपनाई । आरम्भ में औरंगजेब ने यहां के विद्रोही मुस्लिम कबीलों को धन देकर शांत करने का असफल प्रयत्न किया । 1667 ई . में । गुसफजइयों ने अपने नेता भागू के नेतृत्व में विद्रोह किया जिसे दबा दिया गया । 1672 ई . में अकमल खा के नेतृत्व में अफरीदियों ने विद्रोह किया । खुशहाल खा । के नेतृत्व में ‘ खटुक ‘ भी अफरीदियों से आ मिले । 1674 ई . में मुगल सेनापति शुजात खा युद्ध में मारा गया । जुलाई , 1674 ई . में हसन अब्दाल ने शस्त्र , शक्ति व कूटनीति से परिस्थिति को काबू में कर लिया । अफगानिस्तान के मुगल राज्यपाल। अमीर खां ने भी इन लोगों के प्रति समझौते की नीति अपनाई । खुशहाल खां का अपने पुत्र के विश्वासघात के कारण बंदी बना लिया गया ।

औरंगजेब की धार्मिक नीति 

औरंगजेब ने अपने शासन काल में अनेक नेयमों आदि में परिवर्तन किए । उसने अपने शासनकाल की गणना के लिए शाही गौर – वर्ष समाप्त कर दिया । दरबार में गाना – बजाना तथा सार्वजनिक संगीत सम्मेलन को भी बंद करवा दिया । ‘ झरोखा दर्शन ‘ की परिपाटी तथा अपने शासनकाल के 12वें वर्ष में उसने सोना – चांदी व अन्य वस्तुओं से अपना तुलादान किया जाना बंद कर दिया । विजयदशमी तथा अन्य कई हिन्दू त्यौहार व उत्सवों पर रोक लगा दी तथा राज ज्योतिषयों तथा खगोल पंडितों को पदच्युत कर दिया । दरबार से चांदी के धूपदान व कलमदान हटा दिए गए ।

भांग पीने , वैश्यावृत्ति और जुआ खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया । उसने तत्कालीन वेश – भूषा पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया । दाढी तथा पायजामों की लंबाई कानूनन निर्धारित की गई । जरी के कपड़े पहनने मना थे । संतों आदि की कब्रों पर दीपक जलाने बंद करवा दिए गए । 1669 ई . में औरंगजेब ने । ‘ मुहर्रम ‘ मनाना बंद करवा दिया । हिन्दुओं की उच्च पदों पर नियुक्ति नहीं की जाती थी ।

महत्वपूर्ण तथ्य 

  • अफगान सर्वप्रथम जहांगीर के काल में ही मुगलों के मित्र हुए । उन्हें भी मनसबदार बनाया जाने लगा । इसी के काल में भारतीय मुसलमान , जिन्हें शेखजादा कहा जाता था , को भी मनसबदार बनाया जाने लगा ।
  • जहांगीर ने हॉकिन्स को 400 का मनसब दिया था ।
  • जहांगीर ने ही सर्वप्रथम मराठों के महत्व को समझा तथा उन्हें मुगल अमीर वर्ग में शामिल किया ।
  • मुगलों की दक्षिण विजय में सबसे बड़ी बाधा अहमदनगर के योग्य वजीर मलिक अम्बर की उपस्थिति थी।
  • नूरजहां ने एक ‘ जुन्ता गुट ‘ बनाया था , जिसमें उसका पिता एत्माद्दौला , माता अस्मत बेगम , भाई आसफ खां तथा शाहजादा खुर्रम शामिल थे ।
  • नूरजहां जहांगीर के साथ झरोखा दर्शन देती थीं , सिक्कों पर बादशाह के साथ उसका भी नाम अंकित होता था और शाही आदेशों पर बादशाह के साथ ।
  • उसका भी हस्ताक्षर होता था ।  नरजहां की मां अस्मत बेगम ने इत्र बनाने की विधि का आविष्कार किया ।
  • नरजहां ने अपना अंतिम जीवन 2 लाख रुपये प्रतिवर्ष की पेंशनभोगी बनकर लाहौर में बिताया ।
  • 1645 ई . में उसकी मृत्यु हो गई ।
  • जहांगीर के काल में 1622 ई . में कार को फारस के शाह ने मगलों से छीन लिया था ।

ऐसे ही अगले पढ़ते रहो

औरंगजेब ने हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने की आज्ञा जारी की । अत : 1665 ई . में गुजरात में , 1666 ई . में मथुरा के केशवदेव मंदिर का ‘ कटघरा ‘ ( दारा | शिकोह द्वारा निर्मित ) , 1669 ई . में उड़ीसा , मुल्तान , सिंध , बनारस आदि में मंदिरों को तुड़वाया । उदयपुर में लगभग 235 मंदिर तथा अम्बेर ( जयपुर ) में लगभग 66 मंदिर तोड़े गए । हरिद्वार तथा अयोध्या में भी अनेक मंदिर तोड़े गए । हिन्दुओं के विरुद्ध अनेक दंड – विधेयक लागू किए गए ।

अकबर द्वारा हटाया गया तीर्थयात्रा कर पुनः लगाया गया तथा 1679 ई . में जजिया फिर से हिन्दुओं पर थोप दिया गया । 1665 ई . में हिन्दुओं के ‘ होली के त्यौहार पर प्रतिबंध लगाया गया । इसी वर्ष मुसलमानों के लिए बंदरगाहों पर , हिन्दुओं से आधा कर लगाया गया । 1694 ई . में एक आज्ञानुसार मराठों और राजपूतों को छोड़ कर अन्य हिन्दुओं के लिए ईरानी घोड़ा , हाथी अथवा पालकी की सवारी पर प्रतिबंध लगा दिया गया ।

1702 ई . में हिन्दुओं को अंगूठियों पर हिन्दू देवी – देवताओं के नाम खुदवाने की मनाही । की गई । 1703 ई . में हिन्दुओं द्वारा अहमदाबाद में साबरमती के तट पर मुर्दा की । अन्त्येष्टि पर प्रतिबंध लगाया गया । हिन्दुओं को मुस्लिमों जैसी वेश – भूषा धारण करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया ।

1. औरंगजेब के प्रति विद्रोह

1 . अफगान विद्रोह ( 1667 )

उत्तर पश्चिम के अफगान युसूफजई ने विद्रोह किया । भागू इसका नेता था तथा ‘ खुशहाल खां से नामक कवि प्रेरणादायक । आगे अकमल खां भी इससे जुड़ गया । 1675 ई . इसे मुनीम खां के सहयोग से दबाया जा सका ।

2 . जाट विद्रोह ( 1667 – 1685 ई . ) 

1667 ई . में जाटों ने , जो कि आ मथुरा , ग्वालियर के आसपास क्षेत्रों में रहते थे , गोकूल के नेतृत्व में विद्रोह क्योंकि ये मुगल गवर्नर अब्दुल नवी की नीतियों से असंतुष्ट थे । इस विद्रोह को दबा दिया गया । आगे 1685 ई . में राजाराम के नेतृत्व में पुनः जाट विद्रोह हुआ । इस बार विद्रोहियों ने सिकंदरा स्थित अकबर के मकबरे को खोद दिया तथा उसे | लूट लिया । आगे चूरामण ने जाटों को सैनिक शक्ति के रूप में तब्दील कर दिया । इस परंपरा को बदन सिंह ने आगे बढ़ाया ।

3 . सतनामी विद्रोह ( 1662 ) 

यह विद्रोह मुख्यत : एक सतनामी अनुयायी तथा मुगल सैनिक के झगड़े से प्रारंभ हुआ । सतनामी एक धार्मिक पंथ था जो कि नारनौल तथा मेवात के आसपास केन्द्रीय था । इस पंथ की स्थापना का श्रेय जगजीवन दास को दिया जाता है । सतनामी पंथ के अनुयायी मूलत : निचली जाति के लोग होते थे तथा कृषि व्यवसाय से जुड़े हुए थे । इस विद्रोह को रदनरज खाँ | के अधीन सेना ने दबा दिया ।

4 . बुंदेला विद्रोह

बुंदेला राजपूतों में वीर सिंह बुंदेला को शासन काल में सम्मान प्राप्त था । शाहजहां के काल में उसके । उपेक्षा की भावना से त्रस्त होकर जुझार सिंह के नेतृत्व में विद्रोह कर दबा दिया गया । औरंगजेब के काल में इसी विद्रोह को आगे बढ़ाते हुए छत्र विद्रोह कर दिया तथा पूर्वी मालवा में स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली ।

5 . राजपूतों का विद्रोह

राजपूत विद्रोह की शुरूआत 1678 ई . में के शासक जसवंत सिंह की जमरूद में मृत्यु से प्रारंभ हुई । वस्तुत : औरंगजे जसवंत सिंह के वैध उत्तराधिकारी अजित सिंह के बदले इन्द्र सिंह को सत्ता में का बलपूर्वक प्रयास किया । क्षुब्ध होकर राजपूतों ने दुर्गादास राठौर के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया । आगे इस विद्रोह को औरंगजेब के पुत्र अकबर द्वितीय का भी सहयोग मिला । हलांकि औरंगजेब को अजमेर के पास बंदी बनाने का अभियान विफल रहा , परंतु राजपूतों के सहयोग से अकबर द्वितीय पहले मराठा क्षेत्र तथा पुनः 1683 ई . में फारस भागने में कामयाब रहा ।

6 . सिक्ख

औरंगजेब ने सिक्खों के प्रति भी संकीर्ण धार्मिक दृष्टिकोण अपनाया । सिक्खों के नौवें गुरु तेगबहादुर को 1695 ई . में उसके द्वारा प्रस्तुत मुसलमान बनने के प्रस्ताव को ठुकराए जाने के कारण बहुत यातनाएं देकर मार डाला गया । दसवें गुरु गोविन्द सिंह ने धर्म की रक्षा हेतु ‘ खालसा ‘ का संगठन सैनिक संस्था के आधार पर किया । कहा जाता है कि जब औरंगजेब की मृत्यु निकट थी , उसने सद्व्यवहार का आश्वासन देकर गुरु गोबिन्द सिंह को बुलाया । गुरु अभी मार्ग में ही थे कि 1707 ई . में औरंगजेब की मृत्यु हो गई । 1708 ई . में गुरु गोबिन्द सिंह की एक अफगान ने छुरा मारकर हत्या कर दी । इनके उत्तराधिकारी बन्दाबहादुर ने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।

2. औरंजेब की दक्षिण नीति

1. बीजापुर 

बीजापुर के शासक आदिलशाह ने 1657 ई . की संधि का पालन नहीं किया था । अत : उसे दंडित करने हेतु जयपुर के राजा जयसिंह को 1665 में दक्षिण में नियुक्त किया गया । उसने शिवाजी के साथ परंदर की साँध भी संपन्न का , कन अतिम रूप से बीजापुर को साम्राज्य में शामिल करने में असफल रहा ।  दिसंबर 1672 ई . तक आदिलशाह की मत्य हो चकी थी ।

तत्पश्चात् गुटबदा लाभ उठाकर मुगल सुवेदार बहादर खाँ ने 1676 का असफल अभियान ” के आभयान के बाद 1685 में शाहजादा आजम ने बीजापुर 1679 ई . के दिलेर खाँ के अभियान के बाद 1685 में । पर आक्रमण किया , जिसका नेतृत्व कालांतर में आ 1076 का असफल अभियान किया । रिंगजेब ने संभाला । 22 सितंबर , 7 दिया गया । इस प्रकार बीजापुर पर मुगलों 1686 को बीजापुर के शासक सिकदर आदिलशाह ने आत्मसमर्पण कर दि उसे दौलताबाद के किले में कैद कर दिया गया । इस प्रकार बीजा का अधिकार हो गया ।

महत्त्वपूर्ण तथ्य

  1. अकबर ने तीसरे सिक्ख गुरु अमरदास से भेंट की तथा उसकी पुत्री के नाम कई गांव प्रदान किए ।
  2. 1577 ई . में अकबर ने सिक्ख गुरु रामदास को 500 बीघा जमीन प्रदान की ।
  3. कालांतर में यहीं अमृतसर नगर बसा तथा स्वर्ण मंदिर का निर्माण हुआ ।
  4. फतेहपुर सीकरी का खाका बहाउद्दीन ने तैयार किया था ।
  5. अकबर के दरबार में तीन बार जेसुइट मिशन आया , जिसमें पहली बार 1580 | ई . में ( फतेहपुर सीकरी ) आए मिशन का नेतृत्व एक्वाबोवा ने किया था ।
  6. सलीम ने मानबाई को ‘ शाहे बेगम ‘ का पद प्रदान किया था । बाद में सलीम की आदतों से ( अधिक शराब पीने के कारण ) परेशान होकर शाहे बेगम ( मानबाई ) ने आत्महत्या कर ली ।
  7. उसकी 12 घोषणाओं को ‘ आइने – ए – जहांगीरी ‘ कहा जाता है ।
  8. इन घोषणाओं में एक ऐम्मा ( भूमि का प्रमाणीकरण ) था जो ‘ वाक्याते जहागीरी ‘ में प्रार्थना एवं प्रशंसा के लिए दी गई भूमि के रूप में वर्णित है ।
  9. जहांगीर ने अनेक अभियानों के बाद अंतत : 1617 ई . में खुर्रम को अहमदनगर अभियान पर भेजा तथा खुद माण्डू पहुंच गया ।
  10. बीजापुर के शासक की मध्यस्थता के कारण संधि हो गयी ।
  11. इस संधि के फलस्वरूप जहांगीर ने खुर्रम को ‘ शाहजहां ‘ तथा बीजापुर के शासक को ‘ फर्जद ‘ ( पुत्र ) की उपाधि दी ।
  12. जहांगीर ने श्रीकांत नामक एक हिन्दू को हिन्दुओं का जज नियुक्त किया ।
  13. जहांगीर ने सूरदास को प्रश्रय दिया था तथा उसी के संरक्षण में ‘ सूरसागर ‘ की रचना हुई ।

2. गोलकुण्डा

गोलकुण्डा पर भी यही इल्जाम लगाया गया कि इसने 1656 ई . की संधि का उल्लंघन किया है । इस वक्त शासन की बागडोर अबुल हसन के हाथों में थी , लेकिन वास्तविक शासक ‘ मदना ‘ एवं ‘ अकना ‘ नामक ब्राह्मण थे । 1685 में मुअज्जम ने मुगलों की ओर से अबुल हसन से संधि की , लेकिन पुनः संधि की अवहेलना होने पर स्वयं औरंगजेब ने 7 फरवरी , 1687 को युद्ध का | नेतृत्व किया और इसे अक्टूबर तक जीत लिया । अबुल हसन को 50 , 000 रु . को । वार्षिक पेंशन देकर ‘ दौलताबाद ‘ के किले में कैद कर दिया गया और इस प्रकार | गोलकुंडा मुगल साम्राज्य के अंतर्गत आ गया ।

3. औरंगजेब और मराठे

1663 ई . में शिवाजी के विरुद्ध मुगल सेनापति शाइस्ता खां असफल रहा । उसके बाद शाहजादा मुअज्जम और राजा जयसिंह को भेजा गया । जयसिंह ने 1665 ई . में शिवाजी को पुरंदर की संधि के लिए बाध्य कर दिया । 1666 ई . में शिवाजी को आगरा में मुगल दरबार में उपस्थित होना पड़ा । 1680 ई . में शिवाजी की मृत्यु के पश्चात् औरंगजेब ने सम्भा जी के विरुद्ध युद्ध किया व उसे पकड़ कर मार डाला

उसके पुत्र शाहू को कैद कर लिया गया जो 1708 ई . में मुक्त हुआ । 1689 ई . में सम्भा जी की हत्या के बाद राजाराम ने 1700 ई . तक मराठों का संघर्ष जारी रखा । उसके पश्चात् उसकी विधवा ताराबाई ने यह संघर्ष सफलतापूर्वक चलाया । आवश्यक प्रयत्न करने पर भी औरंगजेब मराठों के विरोध का दमन करने में असफल रहा ।

4. औरंगजेब और अंग्रेज

सर टॉमस रो के समय अंग्रेज व्यापारियों ने मुगल सम्राट के प्रति मित्रता की नीति अपनाई । 1616 ई . में अंग्रेजों को मछलीपट्टनम एक कारखाना स्थापित करने की अनुमति मिल गई । 1639 ई . में फ्रांसीसी डे चन्द्रगिरि के राजा से थोड़ी – सी भूमि पट्टे पर ले ली । शाहजहां ने 1650 – 1651 प्रजों को हुगली और कासिम बाजार में कारखाने बनाने की आज्ञा दे दी । 1685 ई . में शाइस्ता खां द्वारा अंग्रेजों के व्यापार पर स्थानीय रूप से टैक्स । जाने पर अंग्रेजों ने विरोध किया , किन्तु मुगल सेनाओं ने उन्हें पराजित किया ।

लगाये जाने पर अंग्रेजों ने विर । तथा 1688 ई . में अंग्रेज व्यापारियों को सूरत , मछलीपट्टनम और हगली छोट लिए बाध्य होना पड़ा । बंगाल के नए राज्यपाल ने हुगली के अंग्रेजी कारखाने के । उच्चाधिकारी चारनॉक को शाही फरमान द्वारा एक छोटी – सी बस्ती बसाने की आज दे दी । यह छोटी – सी बस्ती बाद में आधुनिक नगर कलकत्ता बन गई ।

5. औरंगजेब और उसके पुत्र

औरंगजेब ने कभी अपने पुत्रों पर विश्वास नहीं किया । शाहजादा अकबर को विद्रोह करके फारस भाग जाना पड़ा । सबसे बड़े शाहजादे सुलेमान को अपने चाचा शाहशुजा से सहानुभूति जताने व उसकी पुत्री से शादी करने के कारण 18 वर्ष कैद में रहना पड़ा । शाहजादा मुअज्जम को भी बीजापुर व गोलकुण्डा के शासकों से सहानुभूति जताने के कारण 1687 ई . से | 1695 ई . तक कैद में रखा गया ।

सबसे छोटे शाहजादे को भी कैद में रखा गया । औरंगजेब ने सदैव अपने पुत्रों को अपने से दूर रखा , क्योंकि वह उनकी गतिविधियों को शंका की दृष्टि से देखता था । जीवन के अंतिम समय पर उसने अपने पुत्रों को बहुत पश्चाताप भरे पत्र लिखे । इन पत्रों के विषय में स्मिथ का विचार है कि औरंगजेब का कठोर आलोचक | भी इस पश्चाताप के दु : ख की गहराई मानने से और मृत्यु – शय्या पर अकेले पड़े इस वृद्ध पुरुष के साथ सहानुभूति किए बिना नहीं रहेगा । मार्च , 1707 ई . में औरंगजेब की मृत्यु हो गई

महत्वपूर्ण तथ्य 

  • शाहजहाँ ने दारा को ‘ शाहबुलन्द इकबाल ‘ की उपाधि से विभूषित किया था ।
  • सम्राट बनने के बाद औरंगजेब ने राहदारी ( आंतरिक पारगमन शुल्क ) , पानदारी । ( व्यापारिक चुगियों ) तथा आबवाबों ( स्थानीय करों ) को समाप्त कर दिया ।
  • अपने शासन के 11वें वर्ष में झरोखा दर्शन तथा 12वें वर्ष में तुलादान प्रथा को समाप्त कर दिया । 2 जनता पवित्र कानून ( शरियत ) के अनुसार आचरण कर रही हैं या नहीं , इसकी |
  • देखभाल के लिए औरंगजेब ने महतसिब नामक अधिकारी की नियुक्ति की ।
  • 1 1688 ई . में राजाराम के भतीजे चूडामन ने मथुरा के निकट भरतपुर नामक एक नए स्वतंत्र राज्य की स्थापना की ।
  • मुगलों और बुंदेलों के बीच पहली बार संघर्ष ‘ मधकर शाह ‘ के समय शुरू हुआ । 1 1704 ई . में गुरु गोविंद सिंह ने ऑगजेब के पास एक पत्र लिखा था , जिसे जफरनामा कहा जाता हैं ।

शासक

वावर मुगलकालीन शासकों के मकबरे काबुल अकबर जहांगीर शाहजहा । सिकन्दरा ( आगरा ) शाहदरा ( लाहौर ) आगरा दौलताबाद या औरंगाबाद औरंगजेन

शासक मुगलकालीन शासकों के मकबरे
वावरकाबुल
हुमायूँदिल्ली
अकबरसिकन्दरा ( आगरा )
जहांगीरशाहदरा ( लाहौर )
शाहजहाआगरा
औरंगजेनदौलताबाद या औरंगाबाद

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