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Jahangir History in Hindi – जहांगीर का शुरू से लेकर अंत तक का पूरा इतिहास

जहांगीर का पूरा इतिहास हिंदी में – Jahangir History in Hindi

Jahangir History in Hindi: जहाँगीर ( 1605 – 1627 ई . ) ‘ मोहम्मद सलीम ‘ का जन्म 30 अगस्त , 1569 ई . को फतेहपर सीकरी में ‘ शख सलीम चिश्ती ‘ की कुटिया में हुआ था । उसकी माता भारमल की पुत्री ‘ मरियम उज्जमानी ‘ थी । अकबर उसे ‘ शेखूबाबा ‘ कह कर पुकारता था । चार वर्ष की । अवस्था में सलीम की शिक्षा का अच्छा प्रबंध किया गया । उसके शिक्षकों में प्रमुख । अब्दुर्रहीम खानखाना था । 13 फरवरी , 1585 ई . में सलीम ( जहाँगीर ) का विवाह राजा भगवान दास की पुत्री मानबाई से हुआ । शाहजादा खुसरो मानबाई का ही पुत्र । था । उसने राजा उदयसिंह की पुत्री जोधाबाई से भी विवाह किया ।

Jahangir History

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1600 ई . में जब अकबर दक्षिण में असीरगढ़ के किले को जीतने में व्यस्त । था तो शाहजादा सलीम ने खुलेआम विद्रोह करके स्वयं को इलाहाबाद का सम्राट | घोषित कर दिया । 1602 ई . में सलीम ने वीर सिंह बुन्देला से अबुल फजल की हत्या करवा दी , किन्तु बाद में अकबर से उसने माफी मांग ली तथा उसे क्षमा कर दिया गया । 1604 ई . में शाहजादा दानियाल की मृत्यु हो गई , अत : सलीम अकबर का इकलौता जीवित पुत्र रह गया । 21 अक्टूबर , 1605 ई . को अकबर ने सलीम को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया । अकबर की मृत्यु के पश्चात् आठवें दिन 3 नवम्बर , 1605 ई . को आगरे के किले में सलीम का राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ । उसने ‘ नूरुद्दीन मोहम्मद जहाँगीर बादशाह गाजी ‘ की उपाधि धारण की ।

सलीम ने जहाँगीर ‘ या ‘ विश्व विजयी ‘ की उपाधि धारण की । उसने अनेक बंदियों को मुक्त कर दिया तथा अपने नाम के सिक्के चलवाए । उसने अपनी नीति की घोषणा जहाँगीर ने आगरे के किले की शाह बुर्ज और यमुना के किनारे एक पत्थर के स्तम्भ के मध्य ‘ न्याय की जंजीर ‘ ( जो शुद्ध सोने की बनी थी तथा लगभग 30 गज लंबी थी ) जिसमें 60 घंटिया थीं , स्थापित करने की आज्ञा दी । ताकि दु : खी जनता अपनी शिकायतों को सम्राट् के सम्मुख रख सके ।

शाहजादा खुसरो का विद्रोह ( 1606 ई . )

जहांगीर के सम्राट् बनने के । पांच महीने पश्चात् ही उसके सबसे बड़े पुत्र खुसरो ने अपने मामा मानसिंह एवं । ससुर अजीज कोका की सलाह पर विद्रोह कर दिया । हुसैन बेग तथा लाहौर का । दीवान अब्दुल रहीम भी उसके साथ हो लिए । शाहजादा खुसरो ने तरनतारन में सिक्खों के पांचवें गुरु अर्जुन देव का आशीर्वाद लिया तथा सहायता भी प्राप्त की । जहांगीर की शाही सेनाओं ने जालन्धर के निकट भैरोवाल में विद्रोहियों को पराजित किया ।

खसरो पकड़ा गया । उसे बंदी बना लिया गया । सिक्खों के गुरु अर्जनदेव को भी तलवार से मौत के घाट उतार दिया गया । 1607 ई . में जहांगीर को खसरो की ये गक घटयंत्र की भनक पड गई और उसने शाहजादा खुसरो को अंधा करवा दिया । 1620 ई . में उसे शाहजादा खुरम ( शाहजहा ) को सौप दिया गया । शाहजादा खम ने अपने दक्षिण अभियान के समय 1621 ई . में खुसरो की हत्या करता है ।

नूरजहां

जहांगीर के इतिहास में नूरजहां की कथा को एक प्रमुख स्थान प्राप्त है । वह तेहरान के निवासी मिर्जा ग्यासबेग की पुत्री थी । ग्यासबेग एक धनी व्यापारी “ मलिक मसूद ” के संरक्षण में भारत आया । कन्धार में उसकी एक पुत्री उत्पन्न हुई । मलिक मसूद ने ग्यासबेग का परिचय अकबर से करवाया तथा वह कालान्तर में काबुल के दीवान के पद पर आसीन हुआ । उसकी पुत्री ‘ मेहरुन्निसा ‘ का विवाह 17 वर्ष की आयु में फारस के | एक साहसी युवक अली कुलीबेग से हुआ ।

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उसे बंगाल की जागीर तथा ‘ शेर अफगान की उपाधि दी गई । जहांगीर को पता लगा कि शेर अफगान शाही आदेशों का उल्लंघन करता है तथा विद्रोही होता जा रहा है । अतः उसने बंगाल के नए राज्यपाल कुतुबुद्दीन को शेर अफगान के विरुद्ध भेजा , किन्तु वह मारा गया । शेर अफगान भी कुतुबुद्दीन के अंगरक्षकों के हाथों मारा गया । 1607 ई . में शेर अफगान की विधवा मेहरुन्निसा को आगरा लाकर सुल्ताना सलीमा बेगम के संरक्षण में रखा गया । 1611 ई . में जहांगीर ने उससे विवाह कर लिया तथा उसे ‘ नूरमहल ‘ की उपाधि दी । बाद में यह उपाधि | नुरजहां ‘ अर्थात ‘ संसार का प्रकाश ‘ कर दी गई ।

मेवाड़ का युद्ध

1597 ई . में राणा प्रताप की मृत्यु के पश्चात । उसका उत्तराधिकारी बना । जहांगीर ने अपने शासन काल में 1605 ई = या की मत्यु के पश्चात् अमर सिंह शासन काल में 1605 ई . में शाहजादा । राज के अधीन मेवाड़ के विरुद्ध संना भेजी । आसिफ खां तथा जफर बेग । जादे के साथ थे । वेवार के दरे ‘ में राणा अमर सिंह तथा मुगल सेना के ध्य संघर्ष हुआ , किन्तु इसका कोई परिणाम नहीं निकला । 1698 ई . में महावत । बां तथा 1609 ई . में अब्दुल्ला खां को अमरसिंह के विरुद्ध ‘ भेजा गया , किन्न । उसने भी कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं किया । 14 ई . में शाहजादा खुर्रम को अमरसिंह के विरुद्ध भेजा गया ।

घोर युद्ध चात राजपूतों को संधि करनी पड़ी । अमरसिंह के साथ कपापर्ण व्यवहार | ा गया । अकबर के समय से जीता हुआ सारा प्रदेश उसे लौटा दिया गया । | नौड़ का किला इस शर्त पर वापस दिया गया कि उसकी मरम्मत नहीं कराई । जाएगी । उसे यह भी आश्वासन दिया गया कि उसे स्वयं दरबार में नहीं जाना | पडेगा । अमरसिंह के पुत्र कर्णसिंह को पांच हजारी मनसबदार बना दिया गया । कहा जाता है कि जहांगीर ने अजमेर के मूर्तिकारों द्वारा बनाई गई अमरसिंह और कर्णसिंह की आदम – कद मूर्तियों को आगरा के शाही बाग में ठीक ‘ झरोखे ‘ के नीचे स्थापित करवाया ।

किश्तवार की विजय ( 1622 ई . )

अकबर के समय किश्तवार पर । अधिकार करने का प्रयत्न किया गया था , किन्तु वह असफल रहा । कश्मीर के राज्यपाल दिलावर खां ने 1620 ई . में किश्तवार के राजा को जहांगीर के सामने पेश किया । राज्यपाल के अत्याचारों से तंग आकर जनता ने विद्रोह कर दिया । विद्रोह का दमन करने के लिए एक बड़ी सेना भेजी गई और 1622 ई . में यहां शांति स्थापित हो गई ।

अहमदनगर से युद्ध ( 1610 – 1620 ई . ) 

अकबर ने अहमदनगर से निजामशाही वंश का अंत कर दिया था । जहांगीर के समय मलिक अम्बर नामक अबीसीनियायी निवासी ने इस वंश की पुन : स्थापना की । उसे उस युग के सर्वश्रेष्ठ सेनानायकों और शासकों में से एक माना जाता है । उसने मराठों को छापामार युद्ध का प्रशिक्षण दिया । मलिक अम्बर ने शाहजादा खुसरो के विद्रोह का लाभ उठाकर अब्दुर्रहीम खानखाना की सेना पर आक्रमण करके 1610 ई . में अहमदनगर पुनः प्राप्त कर लिया । खानखाना को वापस बुलाकर खानेजहां को मलिक अम्बर के विरुद्ध भेजा गया , किन्तु वह भी असफल रहा ।

1616 ई . में गुजरात से शाही सेना खानेजहां के सहयोग हेतु भेजी गयी , किन्तु फिर भी कोई परिणाम नहीं निकला । 1616 ई . में शाहजादा खुर्रम को मलिक के साथ संधि करनी पड़ी । खुर्रम को सम्राट् । ने ‘ शाहजहां ‘ की उपाधि दी तथा 30 , 000 जात और 20 , 000 सवारों का मनसब दिया । बहुत खुशियां मनाई गई , किन्तु वास्तव में न तो अहमदनगर को जीता गया और न मलिक अम्बर की शक्ति का दमन हुआ । 1629 ई . तक , जब तक मलिक अम्बर जीवित रहा , यही परिस्थिति बनी रही ।

कन्धार का मामला

कन्धार को अकबर ने मुगल साम्राज्य का अंग बनाया । था । 1605 ई . में शाहजादा खुसरो के विद्रोह के समय फारस के शासक शाह अब्बास ने खुरासान के सरदार को कन्धार पर आक्रमण हेतु उकसाया , किन्तु उसका आक्रमण असफल रहा । शाह अब्बास से जहांगीर ने इस विषय में पूर्ण अनभिज्ञता प्रकट की । कालान्तर में शाह अब्बास ने जहांगीर का ध्यान केन्धार की ओर से हटाने के लिए 1611 ई . 1615 ई . , 1616 ई . तथा 1620 ई . में बहुत – सी मेंट वे खुशामदी पत्र आगरा मुगल दरबार में भी न दरबार में भेजे । 1621 ई . में शाह अब्बास ने बड़ी सेना के साथ कन्धार पर चढ़ाई कर पर चढ़ाई कर दी ।

जहांगीर ने शाहजहां ( खुर्रम ) को पेना । का नेतत्व करने हेतु कहा , किन्तु उसने संभवत : शासन में नूरजहां के प्रधान कारण सना का नेतृत्व करने से इंकार । से इंकार कर दिया और विद्रोह कर दिया । अत . शाट अब्बास ने आसानी से 45 दिन के घर के बाद चार जीत लिया । जहांगीर ३ कम करने की आज्ञा दी , किन्तु आसफ खां शाहजादा परवेज को कन्धार पर आक्रमण करने की आज्ञा दी , कि । के कहने पर आजाद कर दी गई । फलतः 1622 ई . में कधार के हाथों से निकल गया ।

शाहजहां का विद्रोह ( 1623 – 25 ई . )

शाहजहां ने शाह अब्बास के विरुद्ध कन्धार जाने की अपेक्षा विद्रोह कर दिया । जहांगीर तथा शाहजादा खुर्रम ( शाहजहा ) । के मध्य ‘ बलोचपुर ‘ के स्थान पर युद्ध हुआ । शाहजहां पराजित होकर दक्षिण की ओर भागा । बुरहानपुर होता हुआ वह 1624 ई . में बंगाल पहुंचा । उसने मुगल अधिकारियों के सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार के कारण बंगाल और बिहार पर अधिकार कर लिया । शाहजादा परवेज तथा महावत खां ने शाहजहां को पराजित किया तथा शाहजहां फिर दक्षिण की ओर भाग गया । 1625 ई . में शाहजहां व जहांगीर में समझौता हो गया । शाहजहां ने रोहतास और असीरगढ़ का समर्पण करना स्वीकार कर लिया तथा औरंगजेब और दाराशिकोह को जमानत के रूप में शाही दरबार में भेजा ।

जहांगीर की मृत्यु ( 1627 ई . ) 

अत्यधिक शराब पीने से जहांगीर अस्वस्थ हो गया था । वह स्वास्थ्य को कश्मीर और काबुल में रहकर सुधारने के प्रयत्न में था । जब वह कश्मीर से काबुल जा रहा था तो अत्यधिक सर्दी के कारण लाहौर की ओर लौट गया , किन्तु मार्ग में ही 7 नवम्बर , 1627 ई . को भीमवार नामक स्थान पर उसकी मृत्यु हो गई । उसके शव को शाहदरा ( लाहौर ) में दफनाया गया । जहांगीर के दरबार में विलियम हॉकिन्स ( 1608 ई . ) , विलियम फिंच , सर थॉमस रो ( 1615 ई . ) एवं एडवर्ड टैरी जैसे यूरोपीय यात्री आये थे । जहांगीर के पांच पुत्र थे — ( 1 ) खुसरो , ( 2 ) परवेज , ( 3 ) खुर्रम , ( 4 ) शहरयार तथा ( 5 ) जहांदार ।

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Nazir Husain

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