पूरी दुनिया में मुहर्रम क्यों मनाए जाते हैं | Why are Muharram celebrated?

पूरी दुनिया में मुहर्रम क्यों मनाए जाते हैं: मोहर्रम शरीफ को इस्लामी साल का पहला महीना माना जाता है। इसे हिजरी भी कहा जाता है। मुस्लिम सुन्नी, शिया इस त्यौहार को मनाते हैं। हिजरी सन की शुरुआत इसी महीने से होती है इतना ही नहीं इस्लाम के चार पवित्र महीने से इस महीने को भी शामिल किया जाता है। कर्बला मोहर्रम का सूत्रधार है। क्योंकि इराक के मध्य में बसा हुआ कर्बला नाम का एक शहर आम मुसलमान की जहन मैं इमाम हुसैन की शहादत का शाहिद 【गवाह】 है । बगदाद से 55 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम में बसा यह शहर शिया का इलाका है मदीना मक्का के बाद इस्लाम की गई जानकारी इसी कर्बला से मिलती है।

मुहर्रम क्यों

इस शहर के नाम सुनते ही मोहर्रम का इतिहास का महत्व पता चलता है। मोहर्रम को लेकर आज भी सुन्नी और शिया मुसलमानों की अलग-अलग सोच बन गई है। और अब शिया और सुन्नी इमाम हुसैन की याद में यह त्यौहार मनाते हैं इस्लाम की तारीख में पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता यानी खलीफा चुनने का रिवाज रहा है। ऐसे में पैगंबर मोहम्मद के बाद चार खलीफा चुने गए जो लोग आपस में तय करके किसी योग्य व्यक्ति को प्रशासन सुरक्षा इत्यादि के लिए खलीफा चुनते थे जिन्हें योग्य ने हजरत अली को अपना इमाम और खलीफा चुना है।

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पूरी दुनिया में मुहर्रम क्यों मनाए जाते है

मोहम्मद साहब के 【 पर्दा 】मतलब दुनिया से जाने के बाद लगभग 50 वर्ष बाद मक्का से दूर कर्बला के गवर्नर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर लिया था कर्बला जिसे अब सीरिया के नाम से जाना जाता है। वह यजीद अपने अपकक इस्लाम का शहंशाह मानना चाहता था। इसके लिए यजीद ने आवाम में ख्वाब फैलाना शुरु कर दिया था लोगों का को गुलाम बनाने के लिए वह उन पर अत्याचार करने लगा था। और यजीद पूरे अरब पर कब्जा करना चाहता था लेकिन उसके सामने हजरत मोहम्मद की वारिस और उनके कुछ साथियों ने यह यजीद के सामने अपने घुटने नहीं टेके और जमकर मुकाबला किया था।

इसके बारे में और जानें

इमाम हुसैन अपने बीवी बच्चों की सलामती के लिए मदीना से इराक की तरफ जा रहे थे। रास्ते में चलते चलते ही यजीद ने उन पर हमला कर दिया। इमाम हुसैन और उनके साथियों ने मिलकर यजीद की फ़ौज से डटकर सामना किया। और इमाम हुसैन और फौज लगभग 72 लोग थे। और यजीद के पास 8000 से अधिक सैनिक थे। और इमाम हुसैन और उनकी फौज ने यजीद की फौज से टक्कर खूब ली थी।

लेकिन वे इस युद्ध में जीत नहीं सके और सभी शहीद हो गए किसी तरह से इमाम हुसैन इस लड़ाई में बच गए थे। यह लड़ाई मोहर्रम की 2 तारीख से 6 तारीख तक चली। आखरी दिन इमाम हुसैन ने अपने साथियों को कब्र में दफन कर दिया और मोहर्रम के दसवें दिन जब इमाम हुसैन नमाज अदा कर रहे थे तब यजीद ने धोखे से उन्हें भी दुनिया से रुखसत कर दिया। इसी कारण से इमाम हुसैन दुनिया से पर्दा कर गए थे। उस दिन से मोहर्रम को इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के त्यौहार के रुप में मनाया जाता है।

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हम सब मुसलमान इमाम हुसैन को चाहते हैं

मौलाना सैयद तहजीबुल हसन कहते हैं कि कौन मुस्लिम है जो इमाम हुसैन को नहीं चाहता है वो बताते हैं कि शिया का लफ्जी माने मोती और चाहने वाला होता है। यजीद ने जब ईमाम हुसैन समेत 72 साथियों को भूखा प्यासा रखकर 10 मोहर्रम तारीख को 61 हिजरी का कत्ल कर दिया, तब से ही यह प्रश्न शुरू हो गई थी इमाम हुसैन ने अपने बड़े बेटे सैयद जैनुल आबदीन को को वसीयत कर रहा था.

कि मैदान मदीने में मेरे चाहने वालों से मेरा जिक्र करना होगा मौलाना आगे कहते हैं कि पैगंबर मोहम्मद के नवासे 【 नाती】इमाम हुसैन को पूरी दुनिया के मुसलमान चाहते हैं जंगे कर्बला में इमाम हुसैन की शहादत के बाद यजीद के लश्कर जश्न में डूबे थे तब हुसैन के परिवार समेत उनके चाहने वाले लोग गमजदा शौक थे जश्न मनाने वाली लश्कर का आज कोई अनुयानी नहीं है बल्कि मोहर्रम का महत्व दुनिया के सभी मुसलमानों के लिए एक ही है “याद ए इमाम हुसैन”

कब से मोहर्रम शरीफ का जुलूस निकला

मोहर्रम के जुलूस की शुरुआत इराक के कर्बला से होती है। इमाम हुसैन की शहादत के बाद कर्बला में ही सुपुर्द-ए-खाक यानी उनके मजार शरीफ बना दी गई थी फिर शहादत के दूसरे साल ही 6 【हिजरी】 पहली मोहर्रम पर इमाम हुसैन की याद में मजार शरीफ पर लोग जमा होने लगे थे । और यहां पर उन्हें याद करते हुए रोया करते थे और योग्य शहादत 10 मोहर्रम को मातमी जुलूस निकाला गया था इसके बाद ही पूरी दुनिया में इस तरह के जुलूस का प्रथा शुरू हो गई मौलाना रिजवी कहते हैं कि हिंदुओं में मजहब की कई विवेचना है या मोहर्रम के जुलूस में हिंदू भाई भी काफी संख्या से हिस्सा लेते हैं। और 1 तारीख से 10 तारीख तक मोहर्रम का जुलूस निकाला जाता है पूरी दुनिया में।

2018 में मुहर्रम 

मुहर्रम 2018 में 11 सितम्बर से शुरू होगा और अशुरा मतलव मुहर्रम का मुख्या दी 21 सितम्बर को होगा। उत्सव की तारीख स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकती है.

मुहर्रम शायरी

ये दिल भी हुसैनी है,
ये जान भी हुसैनी है.करम “अल्लाह” का है दोस्तों,
अपना तो ईमान भी हुसैनी है.रोनक हैं इस जहाँ मैं “शब्बीर” के सदके से,
मिम्बर भी हुसैनी है अज़ान भी हुसैनी है.तु मानेगा या ना मानेगा अपना तो अक़ीदा है,
हर मोमिन के होंटों पर “क़ुरआन” भी हुसैनी है.“जिबरईल”झुलाते है “हसनैन” के झूले को,
लगता है के “आक़ा” का दरबान भी हुसैनी हे.गिरने नहीं देता है कांधों से “नवासों ” को,
क्या खुब के “नबियों “का “सुल्तान” भी हुसैनी है.मुहर्रम में याद करो वो कुर्बानी,
जो सिखा गया सही अर्थ इस्लामी,
न डिगा वो हौसलों से अपने,
काटकर सर सिखाई असल जिंदगानी.इमाम का हौसला,
इस्लाम जगा गया,
अल्लाह के लिए उसका फर्ज,
आवाम को धर्म सिखा गया.कर्बला की शहादत इस्लाम बना गई,
खून तो बहा था लेकिन हौसलों की उड़ान दिखा गई.

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