ईद-उल-जुहा क्यों मानते है | Why Celebrate Bakra Eid Festival

हम आपके लिए लेकर आए हैं एक इस्लामी पोस्ट, जिसे आप पढ़कर दीन की कुछ बाते जान सकते है। तो हम आपको इस प्रकार बताते हैं। की हमारे इस्लाम धर्म में दो बार ईद मनाई जाती है। सबसे पहली ईद का नाम उर्दू में ईद-उल-फितर होता है, और दूसरी ईद का नाम उर्दू में ईद-उल-जुहा होता है। और यह बकरा ईद , ईद उल-जुहा या ईद उल-अजहा (ईद-उल-जुहा क्यों मानते है | Why Celebrate Bakra Eid Festival) भारत में 23 अगस्त और दिन जुमेरात को ईद मनाई जाएगी। इस बात का एलान दिल्ली जामा मस्जिद ने कर दिया है। बकरा ईद क्यों. Why Eid-ul-Zuhah regards.

और केंद्र सरकार ने मंगलवार को ईद-उल-जुहा के लिए छुट्टी में बदलाव भी कर दिया है, राष्ट्रीय राजधानी स्थित सरकारी दफ्तर 22 अगस्त को नहीं छुट्टी होगी और अब 23 अगस्त को बंद रहंगे। और सभी केंद्रीय विभाग को 22 अगस्त की जगह सबकी सरकारी 23 अगस्त को छुट्टी मिल गई है अब 23 अगस्त को बकरा ईद मनाई जाएगी दिन जुमेरात को ही ईद उल अजहा मनाई जायगी।

Why Eid-ul-Zuhah regards

ईद-उल-जुहा कब मनाई जाती है?

इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक ईद-उल-जुहा 12 वीं महीने धू-अल-हिज्जा की 10 तारीख को बकरा ईद मनाई जाती है। यह तारीख रमजान के पवित्र महीने की खत्म होने की लगभग 70-75 दिन के बाद आती है।

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बकरा ईद क्यों मनाई जाती है? [ईद-उल-जुहा क्यों मानते है]

हम सब मुस्लिम लोग इस बकरा ईद त्यौहार को मनाते हैं। बकरा ईद इस प्रकार मनाई जा रही है की इस्लामिक मान्यता अनुसार हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम अपने बेटे हजरत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा की राह में कुर्बान करने के लिए तैयार थे। तब उन्हीं की याद में यह त्यौहार मनाया जा रहा है।

अल्लाह, हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की परीक्षा लेना चाहता था और इसलिए उन्हें उनसे अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए कहा था। हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे को कुर्बानी के लिए तैयार कर लिया था लेकिन हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम को लगा कि कुर्बानी देते समय उनकी भावनाएं आड़े आ सकती है। इसलिए हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने कुर्बानी करते समय अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली और जिससे हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम समझे कि मेरा मन मचल नहीं जाए इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी।

इसके बारे में और जानें

हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम जब अपने बेटे पर छुरी लेकर अपने बेटे को कुर्बान करने जा रहे थे। हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे की गर्दन पर छुरी रखी तो बेटे की गर्दन पर छुरी नहीं चली तब हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम अपनी छुरी को खूब धार लगी लेकिन हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के बेटे के ऊपर छुरी नहीं चली तो।

वैसे ही फ़िरास्ते के सरदार जिर्बील अमीन ने बिजली की तेजी से आकर बच्चे की जगह दुंबा रख दिया और दुंबे की गर्दन पर छुरी चली और यह कुर्बानी हो गई तो हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने आंखों पर पट्टी खोली तो देखा कि मक्का के करीब मीना पर्वत की बलिवेदी पर उनका बेटा नहीं बल्कि दुंबा था और दुंबे की कुर्बानी इसी प्रकार हो गई थी उनका बेटा उनके सामने खड़ा था इसी प्रकार पूरे दुनिया भर के हम सब मुसलमान इस मौके पर बकरा ईद का तोहार मानते है। और बकरा ईद पर बकरे की कुर्बानी करते है, और यह तो हर साल में एक बार आता है।

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कुरबानी किन लोगो पर वाजिब है?

ईद के दिन कुरबानी हम सब मुलिम पर वाजिब है, जिस के पास 52.5 तोला चांदी या इसके बारबार की रकम हो, और रकम बो हो जो घर पर ही हो किसी से कोई ताल्लुक न हो। या 3.50 तोला सोना या इन सबका पैसे हो तो और अजाद होना। यह तमाम शर्ते कुर्बानी के पूरे वक्त में होना जरूरी नहीं है बल्कि पूरे वक़्त के किसी एक हिस्से में भी यह तमाम शर्तें पाई गई तो कुर्बानी वाजिब हो जाएगी।

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